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पेरिस में पीएम मोदी के राफेल डील की घोषणा करने से महज 10 दिन पहले अनिल अंबानी ने खड़ी की थी कंपनी: कांग्रेस

रायपुर।  राफेल घोटाले मामले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कहा है कि मोदी जी ने कहा था कि वह देश के संसाधनों की हिफाजत करने वाला चौकीदार बनना चाहते हैं, लेकिन वह चौकीदार नहीं, भागीदार (इस लूट में) हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने पूछा कि मोदी देश को यह क्यों नहीं बताते कि “आखिर क्यों 45000 करोड़ रुपये का ठेका सरकार की स्वामित्व वाली कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड से लेकर एक उद्योगपति दोस्त की कंपनी को दे दिया गया जिसने कभी एक हवाई जहाज तक नहीं बनाया और 35,000 करोड़ के कर्ज में डूबी है।” ना तो पीएम ने और ना ही रक्षा मंत्री ने इसपर कोई जवाब दिया। लेकिन यह सबको पता है कि पीएम मोदी का वह उद्योगपति दोस्त, अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप के अध्यक्ष अनिल अंबानी हैं, जिनकी कुल संपत्ति की कीमत 2016 में फोर्ब्स द्वारा जारी अरबपतियों की सूची के अनुसार 3.3 बिलियन डॉलर थी। अनिल अंबानी के बाकी 50000 रू. की कंपनी के साथ डसाल्ट एवियेशन के साथ करोड़ो अरबो के समझौते को जायज ठहराते हुये बेहद हास्यास्पद तर्क दिये गये है। जिसमें कहा है कि हम अमेरिका में पानी के जहाजों की रिपेयरिंग करते है। इसलिये हमें काम मिला है। अमेरिका के पानी के जहाज सुधारने के कारण फ्रांस के हवाई जहाज बनने का काम एक 10 दिन पहले 50000 रू. की पूंजी वाली कंपनी को मिलना अभूतपूर्व घटना है और एक बड़ा चमत्कार है। 1965 और 1971 के युद्ध में, देश की रक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले जेट, मिग 17, मिग 21, मिग 25, मिग 27 बनाने का काम करने वाले हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड को छोड़कर पानी का जहाज सुधारने वाले अनिल अंबानी की 50000 रू. की कंपनी को राफेल हवाई जहाज बनाने का काम दिया जाना मोदी का जादू है और देश की रक्षा जरूरतो से खिलवाड़ है। मोदी जादूगर है और जादू की वजह से अचानक से राफेल लड़ाकू विमान की कीमत आसमान पर पहुंच गई। “यूपीए द्वारा तय की गई एक राफेल विमान की कीमत 520 करोड़ रुपये थी। मोदी जी फ्रांस गए और राफेल की कीमत को 1600 करोड़ रुपये करने का जादू किया।” चमत्कार यहीं खत्म नहीं होता। अनिल अंबानी ने 2015 में पीएम मोदी के फ्रांस दौरे से महज 10 दिन पहले ही अपनी कंपनी की स्थापना की थी। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन के साथ राफेल डील करने वाली रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की स्थापना 50000 रुपये की बेहद कम पूंजी निवेश के साथ 28 मार्च 2015 को हुई थी। अनिल अंबानी की कंपनी के गठन के महज 10 दिन के बाद 10 अप्रैल को पीएम मोदी ने फ्रांस के साथ राफेल डील की घोषणा की थी। समाचार एजेंसी रॉयटर के अनुसार मोदी ने फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद से अपने फ्रांस दौरे के पहले दिन 10 अप्रैल 2015 को 36 उड़ान भरने के योग्य राफेल विमान भारत को देने को कहा था। फ्रांस की सरकार के सूत्रों ने रॉयटर को ये भी जानकारी दी थी कि “शुक्रवार (10 अप्रैल) को भारत के साथ हुआ सौदा मूल समझौते से अलग था।” अनिल अंबानी द्वारा शुरू की गई कंपनी की अधिकृत पूंजी भी 500000 रुपये थी। कंपनी मामलों के एक विश्लेषक का कहना है कि कंपनी की अधिकृत पूंजी का इतना कम होना प्रमोटर के इरादो पर गंभीर संदेह पैदा करता है। कंपनी की आधिकारिक पूंजी उस साझा पूंजी का अधिकतम मूल्य होती है जिसे संवैधानिक कागजातों द्वारा कंपनी को अधिकृत किया जाता है और जो शेयरधारकों को जारी की जाती है। उद्योग और कॉर्पोरेट मामलों में स्पष्ट है कि इतनी कम रकम की अधिकृत पूंजी वाली कंपनी को बिना नियमों की अवहेलना किये और सरकार द्वारा “मानदंडों के उल्लंघन“ को नजरअंदाज किये हजारों करोड़ रुपये की डील करने की अनुमति दी ही नही जा सकती है। रायटर की यह रिपोर्ट इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह से मोदी सरकार ने पहले 500000 रुपये की अधिकृत पूंजी वाली कंपनी को हजारों करोड़ रुपये की डील करने की अनुमति देकर और फिर अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए यूपीए सरकार द्वारा तय की गई डील की शर्तों को बदलकर नियमों का खुला उल्लंघन किया। देश के साथ और देश की रक्षा के साथ किये गये इस खिलवाड़ से मोदी सरकार के द्वारा किया गया भ्रष्टाचार बेनकाब हो गया है। 35000 करोड़ रुपये के कर्ज में डूबी कंपनी को राफेल जेट विमान के दाम बढ़ाकर 45,000 करोड़ का फायदा पहुंचाया गया।राहुल के हमले के बाद फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा था कि दोनों देश कानूनी रूप से कुछ विशेष जानकारी की हिफाजत के लिए बाध्य हैं, हालांकि, इस बयान में खासकर उस अनुच्छेद का उल्लेख कदापि नहीं किया गया है जो भारत को सौदे की कीमत जाहिर करने से रोकता है। इस मुद्दे पर जवाब देने में अक्षम पीएम ने हालांकि राहुल गांधी के आरोपों का यह कहकर उत्तर देने की कोशिश की, है कि “राफेल लडाकू विमान सौदे पर राजनीति करना अपरिपक्वता है। क्योंकि यह डील दो कंपनियों के बीच नहीं, दो देशों के बीच हुआ था।” लेकिन कुछ सवालो के जवाब बाकी रह गये है। 
एक 10 दिन पुरानी कंपनी को संवेदनशील रक्षा सौदे में साझीदार क्यों बनाया गया? 
क्या मोदी राष्ट्र की सुरक्षा के मुकाबले अपने कॉर्पोरेट दोस्तों की अधिक चिंता करते हैं?

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