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क्या वाकई में पिछले 18 सालों में प्रदेश की जनता को स्वच्छ पेयजल नहीं मिला…

फाइल फोटो

साल 2000 में प्रदेश की प्रगति को लेकर एक नई उम्मीद की किरण जागी थी। प्रदेश की जनता ने यह आस लगाया कि मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद नए प्रदेश के रुप में उभरे छत्तीसगढ़ की उन्नति देश के मानचित्र में अपनी एक अलग ही छाप छोड़ेगी। लेकिन क्या वास्तव में प्रदेश ने पिछले 18 सालों में देश के मानचित्र पर अपनी अलग छाप छोड़ पाई है या सिर्फ सरकारी आंकड़े ने प्रदेश के हाल बयां कर दिए है। खैर प्रदेश में जो भी हुआ है वह विकास को तो दर्शाता ही है। भले ही हमने इंफ्रास्ट्रक्चर में बहुत ज्यादा विकास किया है। लेकिन आज भी प्रदेश की जनता मूलभूत सुविधाओं से वंचित ही नजर आती है।

                             प्रदेश के 13 नगर निगमों , 44 नगर पालिकाओं व 113 नगर पंचायतों को अगर देखा जाए तो आज भी लोग पीने के साफ पानी के लिए सरकारी महकमें पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करते है। इन सभी शासकीय संस्थानों में हर रोज गंदे पानी को लेकर 1300 से भी ज्यादा शिकायतें आ रही है। उसके बाद भी प्रदेश के लोगों को पिछले 18 सालों में साफ पानी की बेहतर व्यवस्था अब तक नहीं की जा सकी है। स्थिति यहीं तक नहीं है, प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिस क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीतकर आए है यह हाल वहां का भी वैसा ही है जैसा की राजधानी में है। राजधानी होने की वजह से यहां के लोगों को तो थोड़ी राहत है, लेकिन अगर राजनांदगांव में पीने के पानी की बात की जाए तो शायद आप मटमैले पानी को देख मुंह धोना भी पसंद नहीं करेंगे।

                            रायपुर संभाग के 246 गांवों का पानी पीने योग्य नहीं है। इन गांवों का पानी लोगों की हड्डियां कमजोर कर रहा है। यह खुलासा राज्य स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग ने किया है। प्रभावित गांवों में दंतरोग और हड्डियों से संबंधित मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। बस्तर और बीजापुर के 9-9 गांव, बिलासपुर 2, धमतरी 41, जशपुर 23, कांकेर 54, कवर्धा 01, कोरबा 84, कोरिया 4, महासमुंद 02, रायगढ़ 4, रायपुर 246, राजनांदगांव 2, सरगुजा 75, दुर्ग, 6, बालोद 28 और बेमेतरा के दो गांवों के पानी में फ्लोरोसिस और फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक है। प्रदेश के वास्तविक स्थिति को देखा जाए तो वास्तव में प्रदेश के सरगुजा संभाग के सबसे अंतिम गांव से लेकर बस्तर संभाग के सबसे अंतिम गांव तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने में सरकार पूरी तरह से नाकामयाब ही नजर आ रही है। गरियाबंद जिले की अगर बात की जाए तो आप यकीन ही नहीं करेंगे की जिला मुख्यालय से कुछ ही दूर पर बसे सुपेबेड़ा गांव में स्वच्छ पानी की आश लिए बैठे 59 ग्रामीणों की जान ही चली गई। उसके बाद भी इस गांव तक साफ पानी की व्यवस्था तक नहीं की जा सकी। प्रदेश के दूरस्थ अंचलों को देखा जाए तो आज भी लोग पेयजल की व्यवस्था झिरिया से ही करने को मजबूर है। इन बातों को अगर गौर किया जाए तो यही कहा जा सकता है कि वास्तव में मूलभूत सुविधाओं को लेकर प्रदेश आज भी उसी स्थान पर है जहां 18 साल पहले था।

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