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जानिए धारा 377 में अब तक क्या-क्या हुआ

नई दिल्ली। समलैंगिकता को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में गुरुवार को कहा कि देश में सबको समानता का अधिकार है। समाज की सोच बदलने की जरूरत है। अपना फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, कोई भी अपने व्यक्तित्व से बच नहीं सकता है। समाज में हर किसी को जीने का अधिकार है और समाज हर किसी के लिए बेहतर है।

जानिए धारा 377 में अब तक क्या-क्या हुआ

1860 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने भारतीय दंड संहिता में धारा 377 को शामिल किया और इसे भारत में लागू किया।

भारत में सबसे पहले जुलाई 2009, में दिल्ली हाई कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को गैर-कानूनी करार दिया। ‘नाज फाउंडेशन’ की तरफ से दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने धारा 377 को संविधान की धारा 14,15 और 21 का उल्लंघन बताया।

दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बदल दिया और 377 के खिलाफ दिए गए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को ‘कानूनी तौर से लागू’ नहीं हो पाने वाला फैसला करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अगर सरकार चाहे तो इस धारा को खत्म या बदलने के लिए संसद में कोई कानून बना सकती है।

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए समलैंगिक संबंधों को अवैध ठहराया।

2014 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ ‘नाज फाउंडेशन’ की तरफ से पुनर्विचार याचिका दायर की गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

2014 में आई मोदी सरकार ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की धारा 377 पर कोई निर्णय लेगी। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में कहा कि चूंकि अभी मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है इसलिए सरकार कोर्ट का फैसला आने के बाद ही इस पर कोई फैसला लेगी। एनसीआरबी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धारा 377 के तहत हुए अपराधों के आंकड़ों को पहली बार एकत्र करना शुरू किया।

2016 में एस जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, सेफ रितु डालमिया, होटल बिजनेसमैन अमन नाथ और बिजनेस एक्ज्यूकेटिव आयशा कपूर ने धारा 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। यह पिटीशन दायर करने वाले सभी लोग जाने-माने LGBTQ अधिकारों के लिए लड़ने वाले और खुद 377 के तहत प्रभावित लोगों द्वारा दाखिल किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा है कि यह संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के विभिन्न प्रावधानों के खिलाफ है।

2017 में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने धारा 377 में बदलाव के लिए भारतीय दंड संहिता (संशोधन) विधेयक लाया था, लेकिन वो लोकसभा में पास नहीं हो पाया। अगस्त, 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘निजता के अधिकार’ पर दिए गए फैसले में सेक्स-संबंधी झुकावों को मौलिक अधिकार माना और यह भी चिह्नित किया कि ‘किसी भी व्यक्ति के सेक्स संबंधी झुकाव उसके राइट टू प्राइवेसी का मूलभूत अंग’ है। इस फैसले में कहा गया कि ‘राइट टू प्राइवेसी और सेक्सुअल झुकाव की रक्षा संविधान द्वारा मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने वाले की धारा 14, 15 और 21 के मूल में हैं।’

8 जनवरी 2018 को चीफ जस्टिस की नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय बेंच ने समलैंगिक सेक्स को अपराध से बाहर रखने के लिए दायर अर्जी संविधान पीठ को सौंप दी। साथ ही केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर जवाब देने को कहा।

9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 377 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज (10 जुलाई) से सुनवाई होगी। इस मामले में सुनवाई कुछ समय के लिए स्थगित करने से वाली केंद्र की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया है। बता दें कि केंद्र ने सुनवाई स्थगित करने की मांग की थी और कुछ और समय मांगा था।

किन देशों में नहीं है अपराध?

ऑस्ट्रेलिया, माल्टा, जर्मनी, फिनलैंड, कोलंबिया, आयरलैंड, अमेरिका, ग्रीनलैंड, स्कॉटलैंड, लक्जमबर्ग, इंग्लैंड और वेल्स, ब्राजील, फ्रांस, न्यूजीलैंड, उरुग्वे, डेनमार्क, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड जैसे 26 देशों ने समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है।

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