बिलासपुर। 4 नवंबर को हुए दुखद रेल हादसे की जांच कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (CRS) द्वारा लगभग एक माह की गहन पड़ताल के बाद बड़े निष्कर्षों के साथ सामने आई है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के लिए भेजी गई इस प्राथमिक रिपोर्ट में रेलवे की परिचालन प्रणाली, ट्रेनिंग के मानकों, सिग्नलिंग व्यवस्था और तकनीकी मेंटेनेंस की गंभीर खामियों को दुर्घटना का मूल कारण बताया गया है।प्राथमिक रिपोर्ट विभागीय टिप्पणी और सुधार के सुझावों के लिए भेजी गई है। हालांकि रिपोर्ट गोपनीय है, लेकिन सूत्रों के अनुसार कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जो रेलवे की लापरवाही और सिस्टम की गंभीर विफलताओं की ओर संकेत करते हैं।
100 से अधिक कर्मचारियों से पूछताछ, घटनास्थल का विस्तृत निरीक्षण
CRS ने दुर्घटना स्थल का विस्तृत निरीक्षण किया और विभिन्न तकनीकी पहलुओं को परखा। इसके अलावा 100 से ज्यादा रेल कर्मचारियों, इंजिनियरों, अधिकारियों तथा ट्रेनिंग अधिकारियों से पूछताछ की गई। सभी स्तरों की जानकारी का विश्लेषण करके यह पाया गया कि रेलवे की कार्यप्रणाली में कई गंभीर खामियां मौजूद थीं, जिन्हें सुधारना अनिवार्य है।
सिग्नल ओवरशूट और ट्रेनिंग की कमी बनी मुख्य वजह
रिपोर्ट के अनुसार दुर्घटना के समय ट्रेन का सिग्नल ओवरशूट होना एक बड़ा कारण था। जांच में पाया गया कि:
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सिग्नलिंग सिस्टम में तकनीकी खामियां थीं।
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लोको पायलट को पर्याप्त एवं उचित ट्रेनिंग नहीं दी गई थी।
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ट्रेन चलाने वाले लोको पायलट का अनुभव कम था और वह पूर्व में साइकोलॉजिकल टेस्ट में फेल भी हो चुका था।
फिर भी, उसे ट्रेन संचालन की अनुमति दी गई, जिससे हालात और गंभीर हो गए।
तकनीकी उपकरणों की हालत भी खराब
CRS रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि:
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मेमू ट्रेन के इंजन में लगा सीसीटीवी कैमरा बंद पड़ा था।
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डेटा रिकॉर्डर (ब्लैक बॉक्स जैसी मशीन) ने पर्याप्त डेटा रिकॉर्ड नहीं किया।
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ऐसे उपकरण, जो किसी भी हादसे के बाद कारणों की पहचान में अहम भूमिका निभाते हैं, सही तरीके से काम ही नहीं कर रहे थे।
इमर्जेंसी हूटर ने 7 मिनट बाद दी चेतावनी
हादसे के बाद इमर्जेंसी हूटर 7 मिनट की देरी से बजा, जिसके कारण राहत व बचाव कार्य देर से शुरू हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह देरी नहीं होती, तो शायद कुछ और जानें बचाई जा सकती थीं। इस देरी ने रेलवे की इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
गार्ड और ग्राउंड स्टाफ भी जिम्मेदारी निभाने में विफल
जांच में यह भी पाया गया कि:
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मेमू ट्रेन के गार्ड (ट्रेन मैनेजर) का तकनीकी ज्ञान बेहद कमजोर था।
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ग्राउंड स्टाफ द्वारा कई मानक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
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मेंटेनेंस और सिस्टम चेकिंग की प्रक्रिया अत्यंत लापरवाही से की जाती रही।
हर स्तर पर लापरवाही साबित — 13 लोगों की गई जान
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि दुर्घटना किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं थी, बल्कि यह रेलवे की पूरी परिचालन प्रणाली और ट्रेनिंग व्यवस्था की विफलता का परिणाम था। लोको पायलट से लेकर सिग्नलिंग, गार्ड और अधिकारियों तक, सभी स्तरों पर लापरवाही सामने आई है।
इस लापरवाही की कीमत 13 लोगों की जान ने चुकाई।
अंतिम रिपोर्ट से तय होगी जिम्मेदारी
इस समय यह केवल प्राथमिक रिपोर्ट है। नियमों के अनुसार CRS को घटना के 180 दिनों के भीतर अंतिम रिपोर्ट जारी करनी होती है, जिसके बाद ही दोषियों पर विभागीय और कानूनी कार्रवाई तय होगी।रेलवे अब इस रिपोर्ट के आधार पर कई सुधारात्मक कदम उठाने की तैयारी में है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचा जा सके।

