छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील रसोइयों की हड़ताल गंभीर: 30 दिन में दो महिलाओं की मौत, एक की हालत नाजुक

रायपुर। छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील योजना के तहत सरकारी स्कूलों में कार्यरत रसोइयों की अनिश्चितकालीन हड़ताल अब बेहद गंभीर स्थिति में पहुंच गई है। प्रदेशभर की करीब 86 हजार रसोइया—जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं—पिछले लगभग 30 दिनों से हड़ताल पर हैं। इस दौरान धरना स्थल पर अव्यवस्थाओं के चलते अब तक दो महिला प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है, जबकि एक अन्य की हालत गंभीर बनी हुई है।

रसोइया संघ के प्रदेश अध्यक्ष राजराम कश्यप ने बताया कि तुता, नया रायपुर स्थित धरना स्थल पर बैठी रसोइयों में से शासकीय प्राथमिक शाला सलधा की रसोइया दुलारी यादव की 27 जनवरी को मेकाहारा अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। 25 जनवरी को अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहीं, ग्राम कुसुम कसाव, जिला बालोद की रसोइया रुक्मणी सिन्हा की भी मौत हो चुकी है।

संघ के अनुसार दोनों महिलाओं की मौत का कारण इन्फेक्शन, सर्दी-खांसी और सिर दर्द जैसी बीमारियां बताई जा रही हैं, जो धरना स्थल पर व्याप्त अव्यवस्थाओं से जुड़ी हैं।

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धरना स्थल पर अव्यवस्था के आरोप

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि धरना स्थल पर बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। पीने के लिए साफ पानी उपलब्ध नहीं है और गंदे टैंकर के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। नहाने-धोने और दैनिक जरूरतों के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। शौचालयों की संख्या कम है और जो हैं, वे गंदे व जर्जर स्थिति में हैं।

ठंड और गर्मी से बचाव के लिए तंबू, छत और कंबलों की भी कमी है। इससे पहले भी कई रसोइयाएं डायरिया और पीलिया जैसी बीमारियों की चपेट में आ चुकी हैं। संघ का कहना है कि इन हालातों को लेकर प्रशासन को पहले ही चेताया गया था, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

हड़ताल की वजह और मांग

रसोइयाएं मुख्य रूप से दैनिक मजदूरी बढ़ाने की मांग पर अड़ी हैं। वर्तमान में उन्हें केवल 66 रुपये प्रतिदिन का मानदेय मिलता है, जो कलेक्टर दर से भी कम है। रसोइयों की मांग है कि उन्हें कलेक्टर दर के अनुसार मजदूरी दी जाए।

यह हड़ताल 29 दिसंबर 2025 से जारी है, जिसके चलते राज्य के हजारों सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील सेवा प्रभावित हो रही है।

यह मामला अब महिलाओं के श्रम अधिकारों, न्यूनतम मजदूरी और सरकारी योजनाओं में कार्यकर्ताओं की अनदेखी का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। दो मौतों के बाद प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है कि वह तत्काल धरना स्थल पर सुविधाएं उपलब्ध कराए और रसोइयों की मांगों पर गंभीरता से वार्ता करे, अन्यथा स्थिति और बिगड़ सकती है।

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